
देवपहरी कन्या छात्रावास में मासूम छात्रा की तबीयत बिगड़ने के बाद मौत, अधीक्षक की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
परिजनों-ग्रामीणों ने लगाए लापरवाही के आरोप, अधीक्षक विभा साहू के कथन से भी सामने आए कई सवाल — गंभीर हालत में छात्रा को पालक के सुपुर्द किए जाने का दावा

देवपहरी/कोरबा। देवपहरी स्थित कन्या छात्रावास में महज सात वर्षीय मासूम छात्रा की तबीयत बिगड़ने और उसके बाद हुई मौत ने छात्रावास की व्यवस्था, बच्चों की स्वास्थ्य सुरक्षा और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद परिजनों एवं ग्रामीणों में नाराजगी बताई जा रही है। वहीं छात्रावास प्रबंधन की ओर से सामने आए कथनों ने मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है। परिजनों और ग्रामीणों का आरोप है कि छात्रा की तबीयत सामान्य रूप से खराब होने की स्थिति से आगे बढ़कर बेहद गंभीर हो गई थी। कथित तौर पर बच्ची की हालत इतनी बिगड़ गई थी कि उसकी जुबान और मुंह तक बंद पड़ने जैसी स्थिति बन गई थी। इसके बावजूद उसे तत्काल उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के बजाय छात्रा को उसके पालक के हवाले कर दिए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
अधीक्षक का क्या कहना है?

मामले में छात्रावास अधीक्षक विभा साहू के कथन के अनुसार, वह सप्ताह में केवल दो दिन छात्रावास में उपस्थित रहती हैं और शेष समय अपनी पांच वर्षीय बेटी के साथ रहती हैं। उनके अनुसार छात्रा की अचानक तबीयत खराब होने की सूचना उन्हें स्कूल की शिक्षिका ने दूरभाष के माध्यम से दी थी। अधीक्षक का कहना है कि सूचना मिलते ही उन्होंने बच्ची को छात्रावास लाने के निर्देश दिए। उनके अनुसार छात्रावास पहुंचने के बाद बच्ची को पैरासिटामोल, सिट्रीजिन सहित अन्य दवाएं दी गईं और उससे राहत दिलाने का प्रयास किया गया।
अधीक्षक के कथन के अनुसार बच्ची की तबीयत पहले भी बीच-बीच में खराब होती रहती थी। उन्होंने बताया कि पांचवें दिन जब वह छात्रावास पहुंचीं तो बच्ची के माता-पिता/पालक को बुलाकर उसे उनके सुपुर्द कर दिया गया। छात्रावास प्रबंधन की ओर से यह भी कहा गया कि इसके बाद बच्ची की देखभाल की जिम्मेदारी पालक की थी।

लेकिन यही बिंदु अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आ रहा है। गंभीर हालत में बच्ची को केवल दवाइयों के भरोसे क्यों रखा गया? परिजनों एवं ग्रामीणों की ओर से उठाया जा रहा सवाल यह है कि यदि बच्ची की तबीयत इतनी खराब थी कि उसके मुंह और जुबान की स्थिति तक बिगड़ गई थी, तो क्या उसे तत्काल चिकित्सक के पास ले जाना आवश्यक नहीं था?
यदि छात्रावास प्रबंधन को बच्ची की हालत गंभीर लग रही थी, तो उसे अस्पताल पहुंचाने, डॉक्टर से जांच कराने और उसकी मेडिकल स्थिति की पुष्टि कराने की कार्रवाई क्यों नहीं की गई—यह जांच का महत्वपूर्ण विषय है। ग्रामीणों का कहना है कि छात्रावास में रहने वाली छोटी बच्चियां अपने माता-पिता से दूर रहती हैं। ऐसे में अचानक बीमारी की स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना छात्रावास प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल होना चाहिए।
महिला कर्मचारी के कथित बयान ने बढ़ाई चिंता
मामले में छात्रावास की एक महिला कर्मचारी द्वारा कथित तौर पर कही गई बात भी चर्चा में है। बताया जा रहा है कि बच्ची की हालत को देखते हुए उसे पोहा खिलाने तक में इस आशंका से संकोच हो रहा था कि कहीं वह उसके गले में न फंस जाए।यदि यह कथन सही है और बच्ची की हालत वास्तव में इतनी गंभीर थी कि भोजन निगलने को लेकर भी कर्मचारी चिंतित थी, तो फिर उसे तत्काल चिकित्सकीय जांच के लिए क्यों नहीं भेजा गया—यह सवाल जांच का विषय है।
ग्रामीणों का आरोप—जिम्मेदारी से बचने की कोशिश?
ग्रामीणों एवं परिजनों का आरोप है कि बच्ची की हालत गंभीर होने के बावजूद उसे पालक के हवाले कर दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि कहीं बच्ची की स्थिति और न बिगड़ जाए तथा बाद में छात्रावास प्रबंधन पर जिम्मेदारी न आए, इस आशंका के चलते बच्ची को परिवार के सुपुर्द किए जाने की बात सामने आ रही है।हालांकि यह आरोप है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
छात्रावास की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सवाल
इस घटना ने देवपहरी कन्या छात्रावास में रहने वाली अन्य छात्राओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी चिंता पैदा कर दी है। आखिर छात्रावास में बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जांच की क्या व्यवस्था है? अचानक गंभीर बीमारी की स्थिति में किस अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क किया जाता है? क्या छात्रावास में प्राथमिक उपचार की निर्धारित व्यवस्था है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या गंभीर स्थिति में छात्रा को तत्काल अस्पताल ले जाने की कोई स्पष्ट व्यवस्था लागू है?
इन सभी सवालों का जवाब प्रशासनिक जांच से मिलना जरूरी है।
अन्य छात्राओं में भी डर का माहौल?
ग्रामीणों और परिजनों का कहना है कि घटना के बाद कई बच्चियां छात्रावास जाने को लेकर भी संकोच और भय महसूस कर रही हैं। यदि यह स्थिति वास्तव में बनी है तो यह केवल एक छात्रा से जुड़ा मामला नहीं रह जाता, बल्कि छात्रावास में रह रही सभी बच्चियों की सुरक्षा और अभिभावकों के विश्वास से जुड़ा विषय बन जाता है।
माता-पिता अपनी छोटी बच्चियों को इस भरोसे के साथ छात्रावास भेजते हैं कि वहां उनकी पढ़ाई के साथ-साथ स्वास्थ्य और सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाएगा। ऐसे में किसी बच्ची की गंभीर बीमारी और उसके बाद हुई मौत जैसी घटना पूरे सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है।
अब प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग
इस पूरे मामले में प्रशासन को छात्रा की बीमारी से लेकर उसके पालक को सौंपे जाने और उसके बाद उपचार की पूरी घटनाक्रम की समय-रेखा की जांच करनी चाहिए। छात्रावास का उपस्थिति रजिस्टर, छात्रा की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, दवाइयों का रिकॉर्ड, स्कूल की शिक्षिका द्वारा दी गई सूचना, पालक को सौंपे जाने का विवरण, अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड तथा घटना के समय मौजूद कर्मचारियों के बयान की जांच से वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि छात्रा की गंभीर हालत के बावजूद उसे चिकित्सकीय संस्थान तक पहुंचाने में क्या कदम उठाए गए थे।
मासूम की मौत ने छोड़े कई अनुत्तरित सवाल
देवपहरी कन्या छात्रावास की यह घटना कई सवाल पीछे छोड़ गई है क्या बच्ची की तबीयत बिगड़ने की जानकारी समय पर जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंची थी? क्या उसे समय रहते डॉक्टर को दिखाया गया? क्या केवल दवाइयां देकर स्थिति संभालने का प्रयास किया गया? गंभीर हालत में उसे पालक के सुपुर्द करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया?
और क्या छात्रावास में आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर्याप्त है?
इन सवालों के जवाब केवल निष्पक्ष जांच से सामने आ सकते हैं। एक मासूम बच्ची की मौत के मामले में किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले तथ्यों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। लेकिन यदि जांच में लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय किया जाना भी उतना ही जरूरी होगा।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस संवेदनशील मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच कराता है या फिर यह मामला भी कागजी कार्रवाई तक सीमित होकर रह जाता है।















